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जल - संवाद

सृष्टि में जीवन के लिए हवा और पानी का होना सबसे मूलभूत शर्त है । विज्ञान की अब तक की खोज बताती है कि इन्हीं मूलभूत विशेषताओं के कारण पृथ्वी पर जीवन संभव हो पाया है । दुर्भाग्य का विषय है कि प्राणियों ने, विशेष तौर पर मनुष्य ने इन दोनों मूलभूत आवश्यकताओं के महत्व को जानकर भी समझा नहीं है । इसी का परिणाम है कि आज दुनिया के अधिकांश हिस्सों में हवा – पानी का प्रदूषण और इनकी कमी एक खतरनाक स्थिति निर्मित कर रही है । कुएं, पोखर, तालाब, नदी और समंदर से भरी धरती आज सूख रही है । भारत जैसे प्रकृति के आशीर्वाद से परिपूर्ण देश में भी हवा जहरीली हो रही है और पानी समाप्त हो रहा है ।
अनदेखी एवं चरम उपभोग की संस्कृति के कारण स्थिति ऐसी है कि भौतिक सुख सुविधाओं के लालच में बसाए गए नगरों, महानगरों में पीने तक को पानी नहीं है और गांवों में खेत – कुएं सब सूखे हैं । कुएं सूख चुके हैं, तालाब लगभग खत्म हो चुके हैं, नदियां सूख रही हैं और पेड – पौधों, पशु -पक्षी तक का जीवन खतरे में है । मनुष्य इन स्थितियों के बावजूद सिर्फ कंक्रीट के जंगल खड़े करने की होड़ में धरती के प्राकृतिक संतुलन के साथ लगातार खिलवाड़ कर रहा है । पर्यावरण के असंतुलन से खड़ी हुई समस्याएं बार बार अनेक रूपों में मनुष्य जाति के समक्ष चुनौती बनकर खड़ी भी हो रही हैं किंतु सिवाय बड़े बड़े सम्मेलनों और भाषण, समझौतों के अतिरिक्त जमीनी प्रयास दिखाई नहीं पड़ते । जिन खेतों में किसी वक्त वर्षभर कोई ना कोई फसल लहलहाती थी वो आज साल के तीन सौ पैंसठ दिन वीरान, बंजर नजर आते हैं ।
देश के लगभग सभी राज्यों के ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी तक के लिए संघर्ष के चित्र दिखाई पड़ते हैं । जिन महानगरों को सुख सुविधाओं के केन्द्र के रूप में विकसित किया गया था वहां हवा तो जहरीली है ही बल्कि आधी से ज्यादा आबादी को एक बाल्टी पानी के लिए भी रोजाना एक नई जंग लड़नी पड़ती है । इस जंग में कई बार मारपीट और कत्ल तक हुए हैं । यह उस वीभत्स कल्पना का ही एक छोटा चित्र है जिसमें कहा जाता रहा है कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा ।
दुनिया भर के पर्यावरणविद, सामाजिक कार्यकर्ता और सरकारें भी इस तथ्य से भली भांति वाकिफ है कि यह पानी की यह कमी किस कारण से हो रही है । प्रकृति का स्वंय का एक संतुलन है जिसमें हवा, पानी, पेड़ – पौधे, प्राणियों सहित सभी का एक निश्चित स्थान एवं भूमिका है, किंतु मनुष्य ने अपने लालच और अधिक बुद्धिमत्ता के अभिमान में इस संतुलन को बिगाड़ कर रख दिया है । प्रकृति ने अनेक प्रकार की आपदाओं के माध्यम से बार बार मनुष्य को चेताने की कोशिश की है लेकिन उपभोग की अंधी दौड़ में मनुष्य अब भी प्रकृति के संकेत को अनदेखा कर रहा है । जिन प्रकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल मनुष्य की मूलभूत जरूरतों के लिए किया जाना चाहिए था उसका अंधाधुंध इस्तेमाल बेशुमार सुविधाएं जुटाने के लिए हो रहा है । पानी भी एक ऐसा ही संसाधन है जो सीमित है और उसका उपयोग सूझबूझ एवं प्रकृति प्रदत्त संतुलन के तहत होना चाहिए किंतु इस तथ्य को अनदेखा कर मनुष्य ने ना सिर्फ स्वंय के लिए बल्कि समस्त पृथ्वी के संकट को आमंत्रित कर लिया है । अब भी समय है जब मनुष्य को जल संरक्षण और भू-जल संवंर्धन को लेकर अधिक गंभीर हो जाना चाहिए ।
देश – दुनिया में ऐसे अनेक उदाहरण जहां प्रकृति के समझकर, उससे सामंजस्य बिठाकर पानी की इस समस्या को दूर किया गया है हालांकि इन प्रयासों का दायरा अभी बेहद छोटा है लेकिन फिर भी यह उम्मीद जगाते हैं कि स्थिति अब भी सुधर सकती है । जल संरक्षण एवं संवर्धन के इस प्रकार के विभिन्न उपायों तथा प्रयोगों को समाज के समक्ष लाने और इसे जन जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से डायलॉग इनिशिएटिव फाउंडेशन “जल–संवाद” को अभीष्ट मानता है । हमें आशा है कि हम सम्मिलित प्रयास से एक ऐसे भारत का सपना साकार कर पाएंगे जिसमें नदियां अपनी पूरी गति से बहेंगी, झीलें, तालाब, कुएं लबालब होंगे, खेत – जंगल फिर हरियाली से आच्छादित होंगे ।