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संवाद की अवधारणा

संवाद एक सकारात्मक ऊर्जा देने वाला, प्रेरणा और शांति प्रदान करने वाला एक शब्द है जिसको सुनकर ही हम एक ऐसी बातचीत की कल्पना करते हैं जिसमें शालीनता है, सौम्यता है , सार्थकता है , गहराई है, असहमति की ऊपरी सतह के तल में भी सहमति का एक तल है । इस शब्द से जुड़ा यह अर्थ हमें हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा से मिलता है । वर्तमान समय में जिस प्रकार पाश्चात्य परिभाषाओं की गफलत में संचार को ही संवाद के अर्थ में प्रयुक्त किया जाने लगा है उससे इस शब्द के अर्थ के विश्लेषण की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है । संवाद के विषय में अध्ययन की पृष्ठभूमि में कुछ प्रश्न उत्पन्न होते हैं जिनका निदान ही संवाद की वास्तविक परिभाषा को निर्मित करने में सर्वाधिक श्रेयस्कर हो सकता है । यह प्रश्न निम्नलिखित हैं –
क्या अपनी – अपनी बात कह देना भर संवाद है ?
क्या एक दूसरे के साथ सहमत हो जाना मात्र संवाद है ?
क्या संवाद और ‘आपसी बातचीत’ दोनों समानार्थी हैं ?
क्या अपनी मान्यताओं, धारणाओं, आग्रहों और अपेक्षाओं की सशक्त अभिव्यक्ति संवाद है ?
क्या संवाद और बहस में कोई गुणात्मक अंतर है ?
क्या असहमतियों से बचकर सहमतियों और अर्ध – सहमतियों की संकरी पगडंडी पर चलते रहने जैसी बातचीत संवाद है ?
संवाद और ‘वाद – विवाद’ एक दूसरे से भिन्न कैसे हैं ?
क्या संवाद एक स्वाभाविक प्रक्रिया है या यह एक विद्या या कला है जिसे सीखने की आवश्यकता होती है ?
संवाद की भारतीय अवधारणा के ही समान पश्चिम में कुछ विद्वानों ने इस शब्द के अर्थ को व्यापकता के साथ समझा है । लंदन युनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे डेविड बोम संवाद यानि डायलॉग के बारे में कैलिफोर्निया में प्रस्तुत अपने एक शोध पत्र में कहते हैं

“A Dialogue can be among any number of people, not just two. Even one person can have a sense of dialogue within himself, if the spirit of the dialogue is present. The picture of image that this derivation suggests is of a stream of meaning flowing among and through us and between us. This will make possible a flow of meaning in the whole group, out of which will emerge some new understanding.”

डेविड बोम संवाद के माध्यम के एक चेतना के प्रवाह की वही बात कहते हैं जो लगभग भारतीय दर्शन का मूल है । आचार्य शंकर से लेकर स्वामी विवेकानंद तक सभी इस एक चैतन्य प्रवाह की ही बात करते हैं । इसलिए कहा जा सकता है कि कहीं ना कहीं पाश्चात्य विद्वानों को भी संवाद की भारतीय अवधारणा से सम्मति है ।