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संसदीय संवाद

जनतंत्र , लोकतंत्र या डेमोक्रेसी दुनिया की सबसे बेहतरीन शासन व्यवस्था मानी जाती है क्योंकि इसमें शासित किए जाने वाला वर्ग यानि जनता ही शासन करने वालों को चुनती है और उनको बदलने का अधिकार भी रखती है । जनतंत्र ही वह व्यवस्था है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति की राय या उसका मत महत्वपूर्ण है । यह मत ना केवल जनप्रतिनिधियों के चुनाव के समय अहमियत रखता है बल्कि प्रत्येक मुद्दे पर अभिव्यक्त भी होता है । लोकतंत्र की विशेषता ही है कि इसमें संवाद के लिए निरंतर अधिक से अधिक अवसर एवं अनुकूलता बनती है । गांव की पंचायत से लेकर लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत संसद तक सभी संस्थाएं संवाद के कारण उपयोगी एवं विश्वसनीय बनती हैं । एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति का संवाद, व्यक्तियों का समाज में संवाद, समाज का राजनीतिक दलों से अथवा प्रतिनिधियों से संवाद और प्रतिनिधियों का व्यवस्था के भीतर संवाद अर्थात पंचायत , परिषद , विधानसभा या संसद में संवाद , यह एक निरंतर प्रक्रिया है जिसके कारण लोकतंत्र परिपक्व एवं सुदृढ होता है ।
यान्कूलोविक नामक संवाद विशेषज्ञ की एक परिभाषा के अनुसार संवाद समाज के सबसे मूल्यवान संपत्ति में से एक है । संवाद सत्य की खोज में मदद करता है , संबंधों और विश्वास को प्रगाढ़ करता है , और मानवता के श्रेष्ठ उद्देश्यों एवं नीतियों के लिए समाज को एक करता है । संवाद कुछ बुद्धिजीवियों का बौद्धिक विलास नहीं किंतु दिन प्रतिदिन समाज को प्रगति की रास्ते पर ले जाने वाली प्रक्रिया है जिससे वैचारिक बाधाओं में अटकी ऊर्जा विकास में प्रवृत्त होती है । हम यह कह सकते हैं संवाद एक सकारात्मक प्रक्रिया है जिससे विचार के प्रवाह में आने वाली रुकावटों को दूर किया जाता है । संचार जब संवाद बनता है तभी वह मानव कल्याण के उद्देश्य की पूर्ण प्राप्ति कर पाता है । अपनी बात कह देना तब तक उद्देश्यविहीन है जब तक प्राप्तकर्ता के लिए उसका कोई महत्व ना हो ।इस बात कहने से लेकर उसके अर्थ के निष्पादन तक की यात्रा का दुनिया की राजनीतिक व्यवस्था के लिए भी बड़ा महत्व है ।
संवाद की सार्थकता के बिना विश्व की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था अर्थात जनतंत्र का विकसित होना संभव ही नहीं है । जनतंत्र की मूल अवधारणा में ही संवाद है, व्यक्ति का व्यक्ति से संवाद, व्यक्ति का समाज से संवाद, व्यवस्था का व्यक्ति और समाज से संवाद , इसी प्रकार तो जनतंत्र का विकास हुआ है । इसलिए श्रेष्ठ लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं संवाद की असीमित संभावनाओं को तलाशती हैं और इसके लिए रास्ते बनाती हैं । भारत में जाति, क्षेत्र, समाज की अनौपचारिक पंचायतों और चुनी हुई ग्राम पंचायतों से लेकर संसद तक सब व्यवस्थाओं केन्द्र में संवाद ही है । आदर्श जनतंत्र में ना केवल शासन में आम जन की सीधी हिस्सेदारी होती है बल्कि इस हिस्सेदारी को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न स्तरों पर निरंतर संवाद की सुविधा होती है ।
जनतंत्र में विभिन्न स्तरों पर संवाद का होना उसे अधिक मजबूत बनाता है और संसदीय संवाद इसका श्रेष्ठ उदाहरण है । जनप्रतिनिधियों, विधानसभा या संसद के सदस्यों के बीच संवाद , महज कुछ व्यक्तियों के बीच होने वाला प्रश्नोत्तर नहीं है बल्कि यह संपूर्ण देश का संवाद है । देश के अंतिम व्यक्ति की बात व्यवस्था तक पहुंचाना और व्यवस्था की ओर से उस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त कर आखिरी व्यक्ति की समस्या का समाधान सुनिश्चित करना इस संवाद का उद्देश्य है । इस संवाद का एक स्वरूप हम विधानसभा या संसद के नियमित सत्रों के दौरान देखते हैं जिसमें प्रत्यक्ष सवाल जवाब का अवसर होता है लेकिन इसके अतिरिक्त जनता की ओर से जनप्रतिनिधि व्यवस्था से निरंतर संवाद स्थापित करते हैं जिसके कारण जनतांत्रिक व्यवस्था में जनता का सीधा सहभाग नज़र आता है । यह संवाद ही है जो किसी जनप्रतिनिधि को सीधा जनता से जोड़कर रखता है और जब भी यह संवाद प्रक्रिया कमज़ोर पड़ती है या फिर इसमें कोई बाधा खड़ी होती है तो जनता परिवर्तन की ओर उन्मुख होती है ।
यह स्पष्ट है कि जनतंत्र में जनता और व्यवस्था के विभिन्न स्तरों से उच्चतम स्तर तक यह संवाद अत्यंत आवश्यक है । यह किसी पारिस्थितिक तंत्र की तरह कड़ी दर कड़ी जुड़ा होता है और किसी एक भी कड़ी से टूटने या कमज़ोर होने से समूची व्यवस्था के कमजोर होने की शुरुआत हो सकती है । जनतंत्र में व्यक्ति से लेकर समूचे तंत्र में संवाद एक प्राणवायु की तरह कार्य करता है जिसके अभाव में सम्पूर्ण वातावरण दमघोंटू होने लगता है । संवाद की इस अहमियत को समझते हुए जनतंत्र में इसकी भूमिका, जरूरतऔर विभिन्न आयाम एवं स्वरूपों पर विस्तृत अध्ययन अत्यंत आवश्यक है । इसी क्रम में संसदीय संवाद के महत्व, आवश्यकता, स्वरूप और भारतीय जनतंत्र के परिप्रेक्ष्य में इस संवाद यात्रा को समझने के लिए व्यापक विमर्श की आवश्यकता है जिसके लिए डायलॉग इनिशिएटिव फाउंडेशन प्रतिबद्ध है । इसी प्रतिबद्धता के अन्तर्गत फाउंडेशन के संस्थापक ट्रस्टी ने संसदीय संवाद पर व्यापक अध्ययन, विमर्श, शोध एवं संवाद किया है जो वाणी प्रकाशन द्वारा “संसदीय संवाद एवं जनतंत्र” नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित भी है ।